मैं क्यों लिखता हूँ—बहुत बार अपने आप से सवाल करता रहा हूँ। परन्तु इस उम्र तक सन्तोषजनक उत्तर नहीं पा सका। आज एक बार फिर उसी सवाल से रू—ब—रू हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ? पता नहीं कैसे मुझे लगा और त्वरित ये शब्द मेरे मुख से निकले कि 'शायद मंै अपने लेखन द्वारा उन लोगों का कर्ज उतार रहा हूँ जिनकी बदौलत मैं लेखक हुआ हूँ यानि जो मुझे लेखक मानते हैं, जो मुझे पढ़ते हैं और जिन्हें मेरी कविताओं में भी ढूंढा जा सकता है।Ó
लगता है, कविता लिखने की मुझे आदत सी हो गई है। मैं 'कैज़ुअलÓ किस्म का लेखक हूँ—धड़ाधड़ लिखना मेरी $िफतरत हो ही नहीं पाई। लिखने के लिए लिखना — मुझे व्यापारिक—सा दृष्टिकोण लगता रहा है। आज भी मैं ज़रूरत समझ कर नहीं लिखता, किसी के मजबूर करने पर भी नहीं लिखता— बस लिखता हूँ तब, जब कई—कई घंटे मेरे पास बोलने को कुछ नहीं होता— यानि मेरे कम बोल पाने की स्थिति मुझे लिखने को विवश करती है। सच, मैं अपना मौन तोडऩे के लिए लिखता हूँ। मुझे लगता है कि मेरी हर कविता— कविता की हर पंक्ति— पंक्ति का हर शब्द जैसे कोई 'आपात्कालÓ हो जिससे आप बड़ी—बड़ी उम्मीदें कर सकते हैं, उससे क्यास लगा सकते हैं, अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं। मुझे हमेशा लगा है कि मेरी कविताएं उम्मीदों का संसार रचती हैं। कविता लिखते वक्त मुझे लगता है कि मैं अपने आप को नोच रहा हूं, अपनी खाल उधेड़ रहा हूँ या फिर खाज कर रहा हूँ। प्रयोजन, मेरी कविता का अहम् सबक है — यह तो निश्चित है।
मैं नहीं जानता कि मेरी कविताओं ने कहाँ, कितना कुछ किया है, कहाँ, कितना कुछ कर रही हैं और कहाँ, कितना कुछ करेंगी? पर मैं अपनी कविताओं की सामथ्र्य और उनकी ताकत को जानता हूँ। इस मामले में मुझे कतई कोई भ्रम नहीं है क्योंकि मेरी कविताएँ पढ़—सुनकर दस—बीस कवि ही नहीं 'बड़े कविÓ भी हुए हैं। उन्होंने कविता की बानगी में नये मुहावरे भी दिए हैं और दे रहे हैं। मेरे संपर्क के ताप ने उन्हें ऊर्जावान बनाया है— ऐसा उनकी सहमति के आधार पर ही कहने का दु:साहस कर रहा हूँ। यूँ, सैंकड़ों—हज़ारों—लाखों पाठकों की जमात के लिए छोटी—सी पुस्तक बन कर पुलकित होता रहता हूँ। इससे ज्यादा किसी कवि लेखक को उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।
मेरे लिए कविता 'पुरस्कारÓ की नहीं 'पहचानÓ की चीज़ है और अगर यह 'पहचानÓ पाठकों को आश्वस्त करती है और उन्हें सुकून भी देती है तो ज़हिर है कि आखिरकार मैं ही तो 'पुरस्कृतÓ होता हूँ। आप मेरी कविताओं को नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरा हुआ पाएंगे। नैतिक—रागात्मकता मेरी जीवन शैली का छोटा—बड़ा रकबा है। आलोचक बंधु पैमाने तय करें, सो करें— यंत्र घड़ें, सो घड़ें— मैं प्रतीक्षा नहीं करूँ गा, लिखता रहूंगा। उन्हें परीक्षा में डालना मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी मेरी कविताओं पर आक्षेप है कि साधारण /असाधारण पाठकों को परीक्षा में डालती हैं। मैं लिखता हूँ ताकि संवाद कायम रहे अन्यों से ही नहीं स्वयं से भी । संवाद जीवन को गति देता है कुछ कर गुज़रने की प्रेरणा देता है। ढेरों पुस्तकें होते हुए भी मेरा पुस्तकालय मेरे अनुभव हैं— जहां कभी—कभार ही घुस पाता हूँ। शायद इसीलिए मेरा 'कविÓ मुझसे अक्सर नाराज़ रहता है जिसे मनाने के लिए बहुत बार घंटों कवायद करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर म$कसद के रास्ते पर कदम रख पाता हूँ, जहां इस देश के आदमी की फितरत, उसकी नीयत को पढऩे—समझने का 'जुगाड़Ó भिड़ाने में जुट जाता हूँ। सच—झूठ, न्याय—अन्याय, सही—गलत.....जैसे विपरीतार्थक शब्द तराजू के पलड़ों की तरह मेरे सामने झूलने लगते हैं। मैं अच्छा पाठक नहीं हूंँ— बात अटपटी ज़रूर है पर सच्ची है, शत्—प्रतिशत। शायद इसीलिए मैं अपने लेखन में किसी बड़े—छोटे लेखक का प्रभाव नहीं देखता—नकल तो बड़े दूर की बात है। यूँ जब—जब भी मैं कविता,कहानी या कुछ भी — पढ़ता हूँ तो मेरे लिए कवि—लेखक का नाम सदैव गौण हुआ रहता है। जो या जैसी भी कविता मेरे अंदर झुरझुरी पैदा करे या फिर मुझे कंपा दे— मुझे अच्छी लगती है।
लिखना, विशेषकर कविता लिखना मुझे निहायत ही व्यक्तिगत क्रिया लगती है। जिंदगी की इस भागम—भाग में अपने पात्रों को नामज़द करने में मुझे बहुत बार मुश्किल पेश आती है फिर भी उनकी (पात्रों) की कारगुज़ारी मेरी नज़रों से बच नहीं पाती। मेरी कविता, मेरे सामाजिक—हस्ताक्षेप का परिणाम हुए बिना नहीं रहती। इससे कम या ज्य़ादा कविता की परिभाषा हो ही नहीं पाती। सही मायनों में कविता आत्मबोध का खुलासा है— समाज को खोलने की कुंजी है—नंगे सच का 'पाजि़टिवÓ है, संसर्ग—अनुभूत आत्मीयता का पुलिन्दा है।
Issi ki talaash the, der ke baad aaye ho, par intzaar khatam karne aaye ho,wo ho energy, wo hi jazba, shabadon ki jadugari, sirf ek naam Mohan Sapra hi kar sakta hai........
ReplyDeletebahut bardia
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