Tuesday, July 13, 2010

दो प्रेम कविताएं : मोहन सपरा

।।१।। प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ

मिट्टी ने समर्पण किया
और घड़ा हो गई,
ईंट बन गई
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।

जल ने समर्पण किया
और नदी हो गया
समुद्र हो गया
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।

बीज ने समर्पण किया
औÓ फूल बन गया
वृक्ष बन गया
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।

।।२।। प्रेम

प्रेम, हर लहर में
विद्युत की तरह
पसरा पड़ा है
देखें, आओ देखें, औÓ मोहित हो जाएं।

प्रेम, हर शहर में
खुशबू की तरह
फैला पड़ा है
ढूंढें, आओ ढूंढें, औÓ उसी के हो जाएं।

प्रेम, हर पहर में
पुलक की तरह
बसा पड़ा है
छुएँ, आओ छुएँ, औÓ गद्गद हो जाएं।

प्रेम, हर स$फर में
पड़ाव की तरह
बिखरा पड़ा है
रुकें, आओ रुकें, औÓ समर्पित हो जाएं।
मोबा० 98145—27152

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