मैं क्यों लिखता हूँ—बहुत बार अपने आप से सवाल करता रहा हूँ। परन्तु इस उम्र तक सन्तोषजनक उत्तर नहीं पा सका। आज एक बार फिर उसी सवाल से रू—ब—रू हूँ कि मैं क्यों लिखता हूँ? पता नहीं कैसे मुझे लगा और त्वरित ये शब्द मेरे मुख से निकले कि 'शायद मंै अपने लेखन द्वारा उन लोगों का कर्ज उतार रहा हूँ जिनकी बदौलत मैं लेखक हुआ हूँ यानि जो मुझे लेखक मानते हैं, जो मुझे पढ़ते हैं और जिन्हें मेरी कविताओं में भी ढूंढा जा सकता है।Ó
लगता है, कविता लिखने की मुझे आदत सी हो गई है। मैं 'कैज़ुअलÓ किस्म का लेखक हूँ—धड़ाधड़ लिखना मेरी $िफतरत हो ही नहीं पाई। लिखने के लिए लिखना — मुझे व्यापारिक—सा दृष्टिकोण लगता रहा है। आज भी मैं ज़रूरत समझ कर नहीं लिखता, किसी के मजबूर करने पर भी नहीं लिखता— बस लिखता हूँ तब, जब कई—कई घंटे मेरे पास बोलने को कुछ नहीं होता— यानि मेरे कम बोल पाने की स्थिति मुझे लिखने को विवश करती है। सच, मैं अपना मौन तोडऩे के लिए लिखता हूँ। मुझे लगता है कि मेरी हर कविता— कविता की हर पंक्ति— पंक्ति का हर शब्द जैसे कोई 'आपात्कालÓ हो जिससे आप बड़ी—बड़ी उम्मीदें कर सकते हैं, उससे क्यास लगा सकते हैं, अपनी ज़रूरतें पूरी कर सकते हैं। मुझे हमेशा लगा है कि मेरी कविताएं उम्मीदों का संसार रचती हैं। कविता लिखते वक्त मुझे लगता है कि मैं अपने आप को नोच रहा हूं, अपनी खाल उधेड़ रहा हूँ या फिर खाज कर रहा हूँ। प्रयोजन, मेरी कविता का अहम् सबक है — यह तो निश्चित है।
मैं नहीं जानता कि मेरी कविताओं ने कहाँ, कितना कुछ किया है, कहाँ, कितना कुछ कर रही हैं और कहाँ, कितना कुछ करेंगी? पर मैं अपनी कविताओं की सामथ्र्य और उनकी ताकत को जानता हूँ। इस मामले में मुझे कतई कोई भ्रम नहीं है क्योंकि मेरी कविताएँ पढ़—सुनकर दस—बीस कवि ही नहीं 'बड़े कविÓ भी हुए हैं। उन्होंने कविता की बानगी में नये मुहावरे भी दिए हैं और दे रहे हैं। मेरे संपर्क के ताप ने उन्हें ऊर्जावान बनाया है— ऐसा उनकी सहमति के आधार पर ही कहने का दु:साहस कर रहा हूँ। यूँ, सैंकड़ों—हज़ारों—लाखों पाठकों की जमात के लिए छोटी—सी पुस्तक बन कर पुलकित होता रहता हूँ। इससे ज्यादा किसी कवि लेखक को उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए।
मेरे लिए कविता 'पुरस्कारÓ की नहीं 'पहचानÓ की चीज़ है और अगर यह 'पहचानÓ पाठकों को आश्वस्त करती है और उन्हें सुकून भी देती है तो ज़हिर है कि आखिरकार मैं ही तो 'पुरस्कृतÓ होता हूँ। आप मेरी कविताओं को नैतिकता की कसौटी पर खरा उतरा हुआ पाएंगे। नैतिक—रागात्मकता मेरी जीवन शैली का छोटा—बड़ा रकबा है। आलोचक बंधु पैमाने तय करें, सो करें— यंत्र घड़ें, सो घड़ें— मैं प्रतीक्षा नहीं करूँ गा, लिखता रहूंगा। उन्हें परीक्षा में डालना मुझे अच्छा लगता है। वैसे भी मेरी कविताओं पर आक्षेप है कि साधारण /असाधारण पाठकों को परीक्षा में डालती हैं। मैं लिखता हूँ ताकि संवाद कायम रहे अन्यों से ही नहीं स्वयं से भी । संवाद जीवन को गति देता है कुछ कर गुज़रने की प्रेरणा देता है। ढेरों पुस्तकें होते हुए भी मेरा पुस्तकालय मेरे अनुभव हैं— जहां कभी—कभार ही घुस पाता हूँ। शायद इसीलिए मेरा 'कविÓ मुझसे अक्सर नाराज़ रहता है जिसे मनाने के लिए बहुत बार घंटों कवायद करनी पड़ती है, तब कहीं जाकर म$कसद के रास्ते पर कदम रख पाता हूँ, जहां इस देश के आदमी की फितरत, उसकी नीयत को पढऩे—समझने का 'जुगाड़Ó भिड़ाने में जुट जाता हूँ। सच—झूठ, न्याय—अन्याय, सही—गलत.....जैसे विपरीतार्थक शब्द तराजू के पलड़ों की तरह मेरे सामने झूलने लगते हैं। मैं अच्छा पाठक नहीं हूंँ— बात अटपटी ज़रूर है पर सच्ची है, शत्—प्रतिशत। शायद इसीलिए मैं अपने लेखन में किसी बड़े—छोटे लेखक का प्रभाव नहीं देखता—नकल तो बड़े दूर की बात है। यूँ जब—जब भी मैं कविता,कहानी या कुछ भी — पढ़ता हूँ तो मेरे लिए कवि—लेखक का नाम सदैव गौण हुआ रहता है। जो या जैसी भी कविता मेरे अंदर झुरझुरी पैदा करे या फिर मुझे कंपा दे— मुझे अच्छी लगती है।
लिखना, विशेषकर कविता लिखना मुझे निहायत ही व्यक्तिगत क्रिया लगती है। जिंदगी की इस भागम—भाग में अपने पात्रों को नामज़द करने में मुझे बहुत बार मुश्किल पेश आती है फिर भी उनकी (पात्रों) की कारगुज़ारी मेरी नज़रों से बच नहीं पाती। मेरी कविता, मेरे सामाजिक—हस्ताक्षेप का परिणाम हुए बिना नहीं रहती। इससे कम या ज्य़ादा कविता की परिभाषा हो ही नहीं पाती। सही मायनों में कविता आत्मबोध का खुलासा है— समाज को खोलने की कुंजी है—नंगे सच का 'पाजि़टिवÓ है, संसर्ग—अनुभूत आत्मीयता का पुलिन्दा है।
Friday, July 23, 2010
Wednesday, July 14, 2010
अपने ही शब्दों की कैद में
मैंने कमोबेश जो भी लिखा है अधिकतर कविता में ही लिखा है। बात मेरी व्यक्तिगत हो अथवा दूसरों की— उसके लिए मैने कविता को ही उपयुक्त माध्यम बनाया है। दूसरे शब्दों में कविता मेरी अभिव्यक्ति का सहज—सरल साधन रही है। अतीत में झांकूं तो मुझे याद आती है अपनी पहली कविता 'चिडिय़ाÓ, सन् 1957 में र$फ कॉपी के पन्नों पर साधारण पैन्सिल से लिखी थी जो आज तक मेरे पास सुरक्षित है। तब से लेकर आज तक मुझे कविता ने ताज़गी दी है —जि़न्दा रखा है।
66वें वर्ष की दहलीज़ तक पहुंचने को हूँ। सन 2002 में 34 वर्षों के प्राध्यापकीय धर्म को निभाने के पश्चात् डी.ए.वी. कालेज, नकोदर से सेवानिवृत्त हो चुका हूँ। एक बेटे और दो बेटियों का सफल/असफल पिता और एकदम जि़म्मेदार सफल पति हूँ। अपने को छोड़कर किसी अन्य से कोई शिकायत—शिकवा नहीं— जि़ंदगी में हर सुख—सुविधा पाई है तनिक ज़द्दोज़हद के साथ। सहजे से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, सिवाय मान—सम्मान के—जितना भी मिला। परिचितों की कोई कमी नहीं रही। देश—विदेश के मित्रों की एक लंबी सूची है। लगभग सभी का प्यारा मित्र हूँ। दो—चार दुश्मन—दोस्त भी हैं—एक लंबे अरसे से नाराज़ हैं। कोशिश करूंगा कि वे फिर से मित्र बनें। मुझे लगता है कि दुश्मन—दोस्त के बिना आप 'भीड़ के आदमीÓ हो जाते हैं और भीड़ का आदमी कौन बनना चाहेगा। कम—से—कम मैं तो कभी नहीं, खैर.....
जन्म से लेकर अब तक की जि़ंदगी का नापतोल करने का पहला मौका है जब अपने बारे में अपने ही शब्दों में लिखने की मजबूरी सामने है। इसके लिए डा. रूप देवगुण के आग्रह ने मुझे मित्रता के नैतिक कत्र्तव्यों के प्रति जागरूक कर दिया। रूप भाई नैशनल कालेज सिरसा में मेरे सहपाठी ही रहे। बचपन और कालेज समय की ढेरों स्मृतियाँ सामाजिक सरोकारों से हमें जोड़ती रही हैं। प्रथम कक्षा से स्नातक होने तक की शिक्षा की उपलब्धियों में हम एक दूसरे के गवाह रहे हैं। जालन्धर के खालसा कालेज में एम.ए. की शिक्षा पाने के दौरान भी सहचर्य बराबर बना रहा। उनके जीवन व लेखन ने सदैव मेरा ध्यान खींचा है। कभी प्रेम—स्नेहवश तो कभी सकारात्मक ईष्र्या ने उनसे सम्पर्क साधने की विवशता पैदा की। सच पूछें तो रूप भाई सहज—सरल स्वभाव वाले निश्चल मित्र हैं। मेरे बारे में वे क्या सोचते हैं—कभी गम्भीर होकर पूछूंगा।
भारत—पाक विभाजन से पूर्व 2 नवंबर 1942 में अमृतसर में जन्म हुआ—1944 में फाजि़ल्का, 1945 में जीरा, फतेहाबाद और 1947 में सिरसा में स्थायी तौर पर जा टिके। 1948 में आर्य प्रा.स्कूल, सिरसा से पढ़ाई का सिलसिला शुरू किया। एक वर्ष बाद ही सरकारी प्रा.स्कूल में शिफ्ट कर गया और छटी कक्षा के लिए उच्च सरकारी स्कूल में जा दाखिला लिया जहां दसवीं तक की शिक्षा पाई और तत्पश्चात् नैशनल कालेज, सिरसा से बी.ए.पास किया। चौदह वर्ष के शैक्षणिक जीवन में अनेक उतार—चढ़ाव देखे। राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक व धार्मिक गतिविधियों में हर तरह की भागीदारी बराबर बनी रही। पिता श्री ए.एन.सपरा के जर्नलिस्ट होने के कारण स.प्रतापसिंह कैरों, चौ.देवी लाल, श्री बंसी लाल, श्री भजन लाल, श्री लीलाधर दु:खी, कामरेड श्री शंकरलाल आदि तत्कालीन राजनीतिक दिग्गजों को नज़दीक से देखने—मिलने का अवसर मिलता रहा। उस समय भी सिरसा राजनीति का सक्रिय गढ़ रहा था। बहुत बार कालेज से पीरियड छोड़कर बाहर से पधारे नेताओं को सुनने—देखने की तलब बराबर बनी रहती थी। साहित्यिक गतिविधियाँ नाममात्र की ही हुआ करती थीं। श्री रमेश चंद्र जी शालिहास व पूरन मुद्गिल जी की उपस्थिति में मैंने , हरभजन रेणु, सुरेन्द्र विमलेश और बाद में स्व.सुरेन्द्र वर्मा, दिलगीर आदि पंजाबी—हिंदी के कवियों ने सिरसा के साहित्यिक मंच को शोभायमान रखा।
स्कूल, कालेज व नगर की गतिविधियाँ मेरा केंद्रीय बिंदु रहीं। डा. चन्द्र शेखर, प्रो. बी.आर.गुप्ता और बाद में डा. ओंकार राही के संपर्क के कारण हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता बनती चली गई और कविता से मेरा नाता मज़बूत होने लगा। हालांकि स्कूल स्तर पर विज्ञान—ड्रांईग का ही विद्यार्थी रहा था। कालेज की समस्त साहित्यिक /सांस्कृतिक गतिविधियों में मेरी (मोहन सपरा), डा. सेवा सिंह, निर्मल वर्मा और रूप देवगुण की भी विशेष भागीदारी रहती थी।
कालेज की पत्रिका 'घग्घर के छात्र सम्पादक होने का गौरव भी मुझे मिला। इसी बीच पिता जी द्वारा प्रारम्भ किए गए ''भारत युग (साप्ताहिक) का सह—सम्पादक बनने का अवसर प्राप्त हुआ। सचमुच मेरे पिता एक अद्भुत इन्सान थे। वे आज भी हरियाणा की पत्रकारिता में खुशबू बनकर फैले हैं—लोग उन्हें याद करते हैं—कोशिश के बावजूद मैं उनकी देन से उऋण नहीं हो पा रहा हूँ। वे महान कर्मयोगी थे। उन्होंने लोगों को दिया ही दिया था लिया कुछ भी नहीं। वे जीवन के अन्तिम पड़ाव तक अपने हक के लिए कोर्ट—कचहरियों में उलझे रहे—जिससे मैं दूर भागता रहा और वे मुझसे नाराज़ रहे। अब तक इस बात का खेद बराबर बना हुआ है। यहीं से मुद्रण व सम्पादन के प्रति मेरी रुचि का श्रीगणेश हुआ। तब तक स्थानीय व पंजाब के भर से निकलने वाली पत्रिकाओं व समाचार पत्रों यथा हिंदी मिलाप तथा वीर प्रताप आदि के लगभग हर विशेषांक में मेरी कविताएं प्रकाशित होने लगी थीं। मित्रों की दृष्टि में 1963—64 तक मैं तत्कालीन पंजाब (अब हरियाणा) का कवि हो गया था। सिरसा से बाहर मैं 1963 में प्रो. सूर्यदेव हंस जी द्वारा हिसार में आयोजित कवि सम्मेलन में जहाँ काका हाथरसी, श्री वीरेंद्र मिश्र, श्री संतोषानंद आदि की उपस्थिति में मैंने दो एक कविताएं पढ़ी थीं। आज मुझे लगता है कि वह कवि सम्मेलन मेरे साहित्यिक क्षेत्र का सिंह द्वार साबित हुआ।
मेरा बचपन बेहद नटखट बना रहा। खेलना—कूदना—शरारतें करना,लडऩा—झगडऩा, मित्र बनना—बनाना और फिर खूब पढऩा भी। स्कूल से लौटने के बाद सांय तक खेलना मेरी मजबूरी हो जाती थी। उसके बाद फिर देर रात तक पढ़ते रहना मेरी जरूरत। बचपन के मित्र आज भी मेरे मित्र हैं। सात—आठ वर्ष का था कि अचानक घर की आर्थिक स्थिति चरमरा गई। पिता और बड़े भाई का व्यवसाय अपनी ज़मीन खोने लगा। समृद्धता हमारे परिवार के शब्दकोश से जैसे खिसकती जा रही थी। घर में सबसे छोटा होने के बावजूद मैं बड़ा होने लगा था—घर की तंगी बखूबी समझने लगा था। असमय ही प्रौढ़ हो गया था। घर की जि़म्मेदारी समझने लगा था। बच्चों की धृष्टताओं को लेकर मैंने कभी भी घर वालों को परेशान नहीं किया था। थोड़े और साधारण कपड़ों में रहना बचपन में ही सीख गया था। आज भी वही—जो जैसा या जितना मिल जाए उसी में सुकून पाने की कोशिश करता हूँ। पत्नी या बच्चों के साथ कुछ खरीदने निकलूं तो ज़रा अधिक ही चूज़ी हो जाता हूँ। हर चीज़ की गुणात्मकता देखने—परखने की आदत बन गई है। इसीलिए खरीदो—फरोख्त करने के लिए मैं उनके साथ कम जा पाता हूँ। मुझे बड़े—बड़े शो—रूमों की बजाय साधारण दुकानों पर जाकर कुछ भी बहुत खरीदना अच्छा लगता है क्योंकि उनसे संवाद की स्थिति सहजे से बन जाती है। पहचान बनती—बढ़ती है। जो सदैव ही मेरी कमजोरी बनी रही है। इसी तंगी—फंगी व संघर्ष के दौरान बड़े भैया ने नावल—पत्र—पत्रिकाओं की दुकान की शुरुआत की। यही समय था जब मैंने पाठ्यक्रम से हटकर ढेरों—सैंकड़ों जासूसी—सामाजिक उपन्यास पढ़ डाले। मुंशी प्रेम चंद, शरत्चंद्र, बंकिम चन्द्र चटटेपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गुरूदत्त जैसे महान उपन्यासकारों की लगभग सभी कहानियाँ और उपन्यास आठवीं—नवीं कक्षा तक ही पढ़ डाले थे। चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, रोहतास मठ जैसे उपन्यास 13—14 वर्ष की आयु में ही एक जुनून के तहत पढ़ गया था। उस समय के चर्चित साप्ताहिक 'ब्लिटज़Ó ने मेरे अंदर राजनीतिक चेतना को उजागर किया था। शायद यही वजह है कि आज मेरी अधिकतर कविताएँ राजनीतिक बोध की सूचक हैं। काश कि आज के तथाकथित आलोचक बिना राग द्वेष के मेरी कविताओं को पढऩे की जहमत तो उठाते। मैं हमेशा अपने परिचितों—मित्रोंं के सामने प्रश्र बना रहा हूँ। न जाने क्यों और कैसे इस स्थिति से दो चार होना पड़ा। सभी की शिकायतों—उम्मीदों पर कभी पूरा नहीं उतरा हूँ। माता—पिता का चहेता बेटा होने के बावजूद उन्हें खुश—सन्तुष्ट नहीं कर सका। बड़े भाई—बहनों को अपने ऊपर गर्व करते कभी नहीं देखा। गुरुवर डा. संसार चंद्र, स्व. डा. चंद्रशेखर, श्री के.के.दीपक, डा. ओंकार राही, डा. बी.आर.गुप्ता जैसे गुरूओं को मैंने उनकी उम्मीदों से बहुत परे का सुकून दिया—ऐसा वे मानते रहे थे। आज भी उनसे बराबर सम्पर्क बना है—वे मुझपर गर्व करते हैं।
तत्पश्चात, परिवार के विरोध व उनकी असमर्थता के बावजूद मैंने खालसा कालेज जालन्धर में एम.ए. हिन्दी के लिए प्रवेश लिया। इस सब का शत—प्रतिशत श्रेय गुरुवर स्व. डा. चंद्रशेखर का ही था। उनका सहयोग—समर्थन न मिलता तो तो शायद मैं सिरसा छोड़ जालन्धर ही न आ पाता। खैर.......जैसे—कैसे मैंने हिंदी एम.ए. पास की। स्थायी नौकरी पाने में मुझे तीन वर्ष लग गए। इस बीच जालन्धर के प्रकाशकीय संसार में बतौर प्रूफ रीडर एवं अनुवादक संघर्ष शुरू किया। इस सब का श्रेय प्रिय मित्र जसपाल समलोक के लिए रिज़र्वड है। मुद्रण संबंधी बारीकियों की जानकारी भी मुझे उनकी प्रिंटिंग प्रैस से ही मिली—परिणाम स्वरूप मुद्रण—प्रकाशन की कला मेरे व्यक्तित्व की अहम् पहचान बन गई है।
मित्रों का मानना है कि मैं सफल गोष्ठीबाज़ हूँ। सच है गोष्ठियाँ करना/करवाना मेरी आदत में शुमार है। मुझे लगता है कि गोष्ठी साहित्य की प्रतिध्वनि सिद्ध होती है। श्रोताओं—पाठकों को जागरूक करती है—मिलने /मिलाने का ज़रिया बनती है, सम्बन्धों में गरिमा पैदा करती है और तार्किक शक्ति देती है। स्नातक होते—होते सिरसा में होने वाली लगभग हर साहित्यिक—$गैर साहित्यिक गोष्ठियों की प्रबन्धकीय जिम्मेदारी कम—ज्यादा मेरे कन्धों पर होती। जालन्धर पहुंचा, विद्यार्थी—काल में खालसा कालेज, दोआबा कालेज या फिर डी.ए.वी कालेज में आयोजित गोष्ठियों में किसी भी प्रकार के निश्चित किए गए उत्तरदायित्व को निभाने में मुझे सुकून मिलता। इसी दौरान सर्वश्री गिरिजा कुमार माथुर, विश्व प्रकाश दीक्षित 'बटुकÓ, डा. संसार चंद्र,डा. लक्ष्मी नारायण लाल, मोहन राकेश सरीखे कवियों /लेखकों के लिए गोष्ठियाँ करने/ करवाने में अहम् भागीदारी निभाता रहा। नकोदर में पहली गोष्ठी का आयोजन डी.ए.वी कालेज, नकोदर में किया था। डा. चंद्र शेखर इस गोष्ठी के मुख्यअतिथि थे और शिव कुमार बटालवी विशिष्ट कवि। बटालवी अपने अंदाज़ में विरह की तान छेडऩे लगे। श्रोता उन्हें सुनकर दीवाने हो रहे थे। पाश अपने आरम्भिक दौर में था—गुस्सैल, बेकाबू। उसने मंच पर पहुंच शिव बटालवी को ऐसी कविताएं लिखने और प्रस्तुत करने की चेतावनी दी और उन्हें मंच से उतरने को मजबूर किया। हंगामा हो गया। बटालवी को नाराज़ होना ही था—हम उन्हें आश्वस्त नहीं कर सके और वह चले गए। यह घटना भूले नहीं भूलती।
फिर यह सिलसिला ऐसा चला कि पंजाबी हिन्दी के लगभग 150—200 लेखकों को नकोदर व आसपास के साहित्य प्रेमियों को रूबरू करवाया। उस्ताद शायर स्व. जोश मलसियानी जी के शेष रहे कार्य को पूर्ण करने की भरसक कोशिश रही। मेरी इस कोशिश में प्रो. कर्मजीत गिल, स्व. विनोद सागर, गुरचरण अरोड़ा, डा. अनिल धीमान ने शतप्रतिशत सहयोग दिया। यह मानने में मुझे कतई गुरेज़ नहीं कि पंजाब का पंजाबी / हिन्दी का कोई ही कवि / लेखक होगा जो हमारे निमन्त्रण पर नकोदर न पहुंचा हो। एक लंबे समय तक नकोदर लेखकों / लेखिकाओं के लिए तीर्थ—स्थली बना रहा। सच कहूँ — मुझे कम लिखने का कतई अ$फसोस नहीं रहा। और न ही अपने आप से कोई शिकायत। हालांकि मुझमें बहुत कुछ लिखने—करने के असीम सामथ्र्य है—ऐसा मित्रों को ही नहीं मुझे भी लगता है।
मेरे लिखने की स्पीड बहुत नहीं है। मेरे मित्रों को मुझसे बहुत अधिक उम्मीदें रहती हैं। उन्हें लगता है कि मेरा सबसे बड़ा दुश्मन मैं स्वयं ही हूँ। बहुत बार महत्वपूर्ण कार्य को स्थगित कर देना मेरी नियति बन गई है। क्या करूँ—जीवन कभी भी नियमित नहीं रहा। हर क्षण, हर पल मैं अपने को व्यस्त पाता हूँ। कभी खाली भी नहीं बैठता। ढेरों महत्वपूर्ण कार्य स्थगित हो जाते हैं। तर्कों—कुतर्कों के सहारे अपने आपको दोषमुक्त कर लेता हूँ और तनाव से छुटकारा पा लेता हूँ।
लगभग एक डेढ़ वर्ष पूर्व से जालन्धर शहर मेरी कर्मभूमि हो गया है। हिन्दी के लिए 'जनश्री एक प्रयासÓ जारी है। मास में एक बार हिन्दी के कवि—लेखक मिल बैठते हैं अच्छा लगता है और सार्थक भी; क्योंकि सभी कुछ—न—कुछ नया लिख कर लाते हैं और सुनते—सुनाते हैं। और साहित्य—सम्पदा में वृद्धि करते हैं।
1970 को मैं अपने जीवन का दूसरा पड़ाव मानता हूँ। जब जीवन की भगदड़ से निजात महसूस की थी—नकोदर में स्थायी रूप से आ टिका था। इसे पूर्व 1968—69 में बी.यू.सी. कालेज बटाला, राजकीय कालेज मलेरकोटला, गुरूनानक कालेज काला अफगाना की अस्थायी नौकरियों ने बार—बार उखाड़ा और तोड़ा भी। उन दिनों लग रहा था कि मेरी रचनात्मकता बेहाल हो रही है। डी.ए.वी. कालेज, नकोदर में बतौर हिंदी विभागाध्यक्ष नियुक्ति हुई थी। नैतिकता मेरे जीवन की हमेशा ढाल रही है। कालिज में अपनी आदतानुसार जि़म्मेदारियों का बोझ अपने ऊपर लेता चला गया। 1970 में ही शादी कर / करवा ली। जि़ंदगी एक नये ट्रैक पर चल निकली—सब कुछ अच्छा लगने लगा—अपने को सुरक्षित महसूस किया। हम एक दूसरे को बनने / बनाने में लग गए। बिना परामर्श आज तक हम कोई निर्णय नहीं लेते। अकेले—अकेले हम बहुत कम सफर करते हैं। हमारी दिनचर्या एकाध घंटे की आपसी गुफ़्तगू से शुरू होती है—इस बीच दो—एक बार चाय पीना मेरी मजबूरी होता है। सन्दीपिका चाय बिल्कुल नहीं पीती—उसे चाय का स्वाद तक नहीं पता। सर्दियों में वह अक्सर कॉफी पी लेती है मात्र अतिथियों का औपचारिक साथ देने के लिए या फिर किसी छोटे—बड़े समारोह में। इसके विपरीत मैं तलबवश दिन में कई बार चाय पी लेता हूँ। बस सांय 6—7 बजे के बाद चाय नहीं पीता—कुछ भी नहीं पीता। सिगरेट—शराब—मांस आदि अन्य किसी भी नशीले पदार्थ में मुझे कोई रुचि नहीं होती—कुछ भी खाना पीना मेरे लिए कभी कोई मजबूरी नहीं रहा।
मैं क्या कुछ जानता हूँ—मुझे कई बार खुद भी नहीं पता लगता। बचपन में बाईडिंग का काम सीखा, लिफाफे बना कर बेचे, पतंग बनाई,उड़ाई और बेची भी। रोटी—सब्ज़ी बनाने का अनुभव बचपन से ही मिल गया था—वैसे यह सब मेरी रुचि में ही शामिल था। जालन्धर में मुद्रण के गुर सीखे और 1975 में प्रिन्टिंग प्रैस स्थापित कर दी—पत्नी सन्दीपिका के सहयोग से। तब तक हिंदी में 'फिरÓ और 'रिजुताÓ पंजाबी पत्रिकाओं के कई अंक निकल चुके थे। 'फिरÓ पत्रिका ने मुझे बतौर सम्पादक पहचान दिलाई। इससे पूर्व 'कीड़ेÓ 1969 में 'वक्त की साजिश के खिला$फÓ 1975 में,'आदमी जि़ंदा हैÓ (1987), बरगद को कटते हुए देखना (1997)और पंजाबी में निंदर घुघियाणवी द्वारा अनूदित 'हवा वांगÓ (1997), और अब 'काले पृष्टों पर उकरे शब्दÓ नाम से नया काव्य—संग्रह प्रकाशित हुआ है।
छोटे—बड़े साधारण ढाबों में बैठकर खाना और उनके मालिकों व नौकरों—चाकरों से बतियाने में मुझे मज़ा ही नहीं अपने अंदर एक खास किस्म की एनर्जी का संचार होता महसूस होता है। हालांकि यह जानते हुए भी कि यह लोग भोजनादी तैयार करने में सफाई का कतई ध्यान नहीं रखते—फिर भी जरूरत पडऩे पर हम उन्हीं के यहाँ से खाना खाते हैं। वैसे यह सब कभी—कभार ही होता है। मेरी पत्नी सन्दीपिका एक बढिय़ा कुक है— लज़ीज़ खाना बनाती है—समय रहते रसोई में कभी—कभी मैं भी उसका सहयोग करता हूँ। हर काम को कला के रूप में सीखना अच्छा लगता है। पेन्टिंग और फोटोग्राफी करना मेरी पहली पसन्द रही है। शायद इसीलिए बचपन से लेकर अब तक पेन्टरों और फोटोग्राफरज़ से मित्रता रखना मेरे जुनून में शामिल है। लगातार अब तक खेद बना है कि मैं अच्छा—बढिय़ा कैमरा नहीं खरीद सका। फिर भी साधारण कैमरों से ढेरों—सैंकड़ों फोटो खींचीं और अब मैं यह काम अपने मोबाईल से करता हूँ और इस कला का प्रयोग अपने मुद्रण—व्यवसाय में करता हूँ। अपने बुजुर्गों के बारे में बहुत कम जानता हूँ। जब यह सब कुछ जाना जा सकता था तब ज़रूरत नहीं समझी और अब माता—पिता नहीं रहे—बड़े भाई—भाभी असमय ही चल बसे। सबसे बड़ी और छोटी बहन का देहावसान मेरे संघर्ष की आपाधापी में ही हो गया। आज तक अजीब सा खेद भी है और इसे मैं प्रकट भी नहीं कर पाता। दादा—दादी की शक्ल आँखों में बसी है। पिता को बरगद होते देखा है। माँ का स्नेह—प्यार उनके आखिरी दिन तक पाने वाला भाग्यशाली रहा हूँ। बड़े भाई का संसर्ग उनके जीवन के आखिरी दिनों में रोगग्रस्त होने के कारण मुझे मिला—वे बड़े ही नर्म दिल इन्सान थे। मैंने उन्हें कभी किसी से झगड़ा करते हुए नहीं देखा था। उनका असमय निधन आज तक कचोटता है। उनके दो बेटे व एक बेटी यानी मेरे भतीजे और भतीजी—सभी शादी—शुदा हैं। वे दो—दो बेटों के पिता हैं। अच्छा—खासा काम—धन्धा है। सन्तुष्ट हूँ कि वे सभी हमारी इज्जत करते हैं—खूब लगाव महसूस करते हैं। अक्सर पारस्परिक खोज—खबर लेते—देते रहते हैं, बराबर प्यार बना है। दो बड़ी बहनें, जिन्होंने मुझे बेटे की तरह प्यार—स्नेह और संरक्षण दिया। उनसे उऋण होना कम—से—कम इस जन्म में तो सम्भव नहीं। वे हर समय मेरे बारे में चिन्तित रहती हैं। उन्होंने नदी की तरह मेरे जीवन को सींचा है।
दो—एक शब्द अपने प्राध्यापकीय जीवन में अति आत्मीय बने रहे छात्र—छात्राओं के बारे में जो मुझे अब तक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और अपने जीवन को अर्थवान बनाने में कम—ज्यादा मेरी भूमिका को स्वीकारते हैं—वैसे यह सब उनकी उदारता है। स्व. अशोक रिखी, विजय रिखी(मलेरकोटला), डा. तरसेम गुजराल, यकम(जालन्धर), भूपेन्द्र परिहार (लुधियाना), राजेन्द्र चुघ (दिल्ली), कृष्ण कुमार रत्तू (जयपुर), रछपाल कलेर (नकोदर), रमेन्द्र जाखू (चण्डीगढ़), देवेन्द्र कुमार चन्द्र (इंग्लैंड), हंस राज (दिल्ली), आर.डी.शर्मा (नेपाल), रामपाल चन्द्र (चण्डीगढ़), डा. अनिल धीमान(फिरोज़पुर), स्व. विनोद सागर, स्व. सूरज वधवा, राकेश कलेर, अशोक संधु, युगल कुंदी (नूरमहल),राजेन्द्र कालड़ा, राजबहादुर, लवन जैन, (यू.के.), अंकुश जैन (फरीदाबाद), सुधा जितेन्द्र (अमृतसर), सुषमा (लुधियाना), मृदुला जैन (दिल्ली) आदि की साहित्यिक—सामाजिक उपलब्धियों को मंै अपनी उपलब्धियों में परिणित करता हूँ और गर्व महसूस करता हूँ।
और अब बेटे विराट और बेटियों आस्था, अनुजा के बारे में। हम उन्हें संस्कारों के अलावा कुछ भी नहीं दे सके या यूँ कहूँ कि वे ले नहीं सके। युवा पीढ़ी एकल चलने और त्वरित निर्णय लेने में विश्वास रखती है। कोशिश करता रहा हूँ कि उनपर अपना कोई निर्णय न थोपूँ। तीनों की शादिया्र हो गई हंै, अपनी—अपनी जि़ंदगी अपने अनुसार जी रहे हैं। काम धंधे में बेटे के साथ हूँ। वह संवेदनशील ,स्वप्रशील और एनर्जेटिक है। पत्नी नलिनी और निश्चय बेटे के साथ जीवन को सारयुक्त बनाने की कोशिश में जुटा रहता है। एक दम नि:छल होने के कारण दोस्त / दुश्मन की पहचान करने में हमेशा गच्चा खाता रहता है और वैसे यह कवि होने की पहली शर्त होती है पर वह कवि नहीं सफल व्यवसायी बन रहा है। आस्था—प्रदीप अपनी एक निहायत कुशाग्र बुद्धि वाली बेटी के साथ सुखद भविष्य की तलाश में हैं। और अनुजा परमजीत प्रथम पायदान पर चलते रह सपने बुन रहे हैं। पिता होने के नाते शुभकामनाएं शत:—शत:......
और अंत में अपने संबंध में। इस उम्र में भी मात्र दर्शक बने रहने में मुझे कोई रुचि नहीं होती। अपने फैसलों पर गर्व करना मेरी फितरत बन गई है और बहुत बार समझौते ढोना मजबूरी। मैं समाज—भीरू इन्सान हूँ, अंदर से नहीं, बाहर से। आज भी अधूरे पड़े सपनों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। समयाभाव के बावजूद कोशिश में रहता हूँ कि पारिवारिक और सामाजिक दायित्व को पूरी तरह से निभाऊँ। न जाने क्यों अपने और पत्नी के स्वास्थ्य के प्रति न चाहते हुए भी उदासीन बना रहता हूँ—यह सब अच्छा तो नहीं ही है।
(यह लेख पुस्तक डॉ. रूप देवगुण द्वारा संपादित पुस्तक ऐसे होते हैं साहित्यकार में संकलित है)
66वें वर्ष की दहलीज़ तक पहुंचने को हूँ। सन 2002 में 34 वर्षों के प्राध्यापकीय धर्म को निभाने के पश्चात् डी.ए.वी. कालेज, नकोदर से सेवानिवृत्त हो चुका हूँ। एक बेटे और दो बेटियों का सफल/असफल पिता और एकदम जि़म्मेदार सफल पति हूँ। अपने को छोड़कर किसी अन्य से कोई शिकायत—शिकवा नहीं— जि़ंदगी में हर सुख—सुविधा पाई है तनिक ज़द्दोज़हद के साथ। सहजे से कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ, सिवाय मान—सम्मान के—जितना भी मिला। परिचितों की कोई कमी नहीं रही। देश—विदेश के मित्रों की एक लंबी सूची है। लगभग सभी का प्यारा मित्र हूँ। दो—चार दुश्मन—दोस्त भी हैं—एक लंबे अरसे से नाराज़ हैं। कोशिश करूंगा कि वे फिर से मित्र बनें। मुझे लगता है कि दुश्मन—दोस्त के बिना आप 'भीड़ के आदमीÓ हो जाते हैं और भीड़ का आदमी कौन बनना चाहेगा। कम—से—कम मैं तो कभी नहीं, खैर.....
जन्म से लेकर अब तक की जि़ंदगी का नापतोल करने का पहला मौका है जब अपने बारे में अपने ही शब्दों में लिखने की मजबूरी सामने है। इसके लिए डा. रूप देवगुण के आग्रह ने मुझे मित्रता के नैतिक कत्र्तव्यों के प्रति जागरूक कर दिया। रूप भाई नैशनल कालेज सिरसा में मेरे सहपाठी ही रहे। बचपन और कालेज समय की ढेरों स्मृतियाँ सामाजिक सरोकारों से हमें जोड़ती रही हैं। प्रथम कक्षा से स्नातक होने तक की शिक्षा की उपलब्धियों में हम एक दूसरे के गवाह रहे हैं। जालन्धर के खालसा कालेज में एम.ए. की शिक्षा पाने के दौरान भी सहचर्य बराबर बना रहा। उनके जीवन व लेखन ने सदैव मेरा ध्यान खींचा है। कभी प्रेम—स्नेहवश तो कभी सकारात्मक ईष्र्या ने उनसे सम्पर्क साधने की विवशता पैदा की। सच पूछें तो रूप भाई सहज—सरल स्वभाव वाले निश्चल मित्र हैं। मेरे बारे में वे क्या सोचते हैं—कभी गम्भीर होकर पूछूंगा।
भारत—पाक विभाजन से पूर्व 2 नवंबर 1942 में अमृतसर में जन्म हुआ—1944 में फाजि़ल्का, 1945 में जीरा, फतेहाबाद और 1947 में सिरसा में स्थायी तौर पर जा टिके। 1948 में आर्य प्रा.स्कूल, सिरसा से पढ़ाई का सिलसिला शुरू किया। एक वर्ष बाद ही सरकारी प्रा.स्कूल में शिफ्ट कर गया और छटी कक्षा के लिए उच्च सरकारी स्कूल में जा दाखिला लिया जहां दसवीं तक की शिक्षा पाई और तत्पश्चात् नैशनल कालेज, सिरसा से बी.ए.पास किया। चौदह वर्ष के शैक्षणिक जीवन में अनेक उतार—चढ़ाव देखे। राजनैतिक, सामाजिक, साहित्यिक व धार्मिक गतिविधियों में हर तरह की भागीदारी बराबर बनी रही। पिता श्री ए.एन.सपरा के जर्नलिस्ट होने के कारण स.प्रतापसिंह कैरों, चौ.देवी लाल, श्री बंसी लाल, श्री भजन लाल, श्री लीलाधर दु:खी, कामरेड श्री शंकरलाल आदि तत्कालीन राजनीतिक दिग्गजों को नज़दीक से देखने—मिलने का अवसर मिलता रहा। उस समय भी सिरसा राजनीति का सक्रिय गढ़ रहा था। बहुत बार कालेज से पीरियड छोड़कर बाहर से पधारे नेताओं को सुनने—देखने की तलब बराबर बनी रहती थी। साहित्यिक गतिविधियाँ नाममात्र की ही हुआ करती थीं। श्री रमेश चंद्र जी शालिहास व पूरन मुद्गिल जी की उपस्थिति में मैंने , हरभजन रेणु, सुरेन्द्र विमलेश और बाद में स्व.सुरेन्द्र वर्मा, दिलगीर आदि पंजाबी—हिंदी के कवियों ने सिरसा के साहित्यिक मंच को शोभायमान रखा।
स्कूल, कालेज व नगर की गतिविधियाँ मेरा केंद्रीय बिंदु रहीं। डा. चन्द्र शेखर, प्रो. बी.आर.गुप्ता और बाद में डा. ओंकार राही के संपर्क के कारण हिंदी के प्रति प्रतिबद्धता बनती चली गई और कविता से मेरा नाता मज़बूत होने लगा। हालांकि स्कूल स्तर पर विज्ञान—ड्रांईग का ही विद्यार्थी रहा था। कालेज की समस्त साहित्यिक /सांस्कृतिक गतिविधियों में मेरी (मोहन सपरा), डा. सेवा सिंह, निर्मल वर्मा और रूप देवगुण की भी विशेष भागीदारी रहती थी।
कालेज की पत्रिका 'घग्घर के छात्र सम्पादक होने का गौरव भी मुझे मिला। इसी बीच पिता जी द्वारा प्रारम्भ किए गए ''भारत युग (साप्ताहिक) का सह—सम्पादक बनने का अवसर प्राप्त हुआ। सचमुच मेरे पिता एक अद्भुत इन्सान थे। वे आज भी हरियाणा की पत्रकारिता में खुशबू बनकर फैले हैं—लोग उन्हें याद करते हैं—कोशिश के बावजूद मैं उनकी देन से उऋण नहीं हो पा रहा हूँ। वे महान कर्मयोगी थे। उन्होंने लोगों को दिया ही दिया था लिया कुछ भी नहीं। वे जीवन के अन्तिम पड़ाव तक अपने हक के लिए कोर्ट—कचहरियों में उलझे रहे—जिससे मैं दूर भागता रहा और वे मुझसे नाराज़ रहे। अब तक इस बात का खेद बराबर बना हुआ है। यहीं से मुद्रण व सम्पादन के प्रति मेरी रुचि का श्रीगणेश हुआ। तब तक स्थानीय व पंजाब के भर से निकलने वाली पत्रिकाओं व समाचार पत्रों यथा हिंदी मिलाप तथा वीर प्रताप आदि के लगभग हर विशेषांक में मेरी कविताएं प्रकाशित होने लगी थीं। मित्रों की दृष्टि में 1963—64 तक मैं तत्कालीन पंजाब (अब हरियाणा) का कवि हो गया था। सिरसा से बाहर मैं 1963 में प्रो. सूर्यदेव हंस जी द्वारा हिसार में आयोजित कवि सम्मेलन में जहाँ काका हाथरसी, श्री वीरेंद्र मिश्र, श्री संतोषानंद आदि की उपस्थिति में मैंने दो एक कविताएं पढ़ी थीं। आज मुझे लगता है कि वह कवि सम्मेलन मेरे साहित्यिक क्षेत्र का सिंह द्वार साबित हुआ।
मेरा बचपन बेहद नटखट बना रहा। खेलना—कूदना—शरारतें करना,लडऩा—झगडऩा, मित्र बनना—बनाना और फिर खूब पढऩा भी। स्कूल से लौटने के बाद सांय तक खेलना मेरी मजबूरी हो जाती थी। उसके बाद फिर देर रात तक पढ़ते रहना मेरी जरूरत। बचपन के मित्र आज भी मेरे मित्र हैं। सात—आठ वर्ष का था कि अचानक घर की आर्थिक स्थिति चरमरा गई। पिता और बड़े भाई का व्यवसाय अपनी ज़मीन खोने लगा। समृद्धता हमारे परिवार के शब्दकोश से जैसे खिसकती जा रही थी। घर में सबसे छोटा होने के बावजूद मैं बड़ा होने लगा था—घर की तंगी बखूबी समझने लगा था। असमय ही प्रौढ़ हो गया था। घर की जि़म्मेदारी समझने लगा था। बच्चों की धृष्टताओं को लेकर मैंने कभी भी घर वालों को परेशान नहीं किया था। थोड़े और साधारण कपड़ों में रहना बचपन में ही सीख गया था। आज भी वही—जो जैसा या जितना मिल जाए उसी में सुकून पाने की कोशिश करता हूँ। पत्नी या बच्चों के साथ कुछ खरीदने निकलूं तो ज़रा अधिक ही चूज़ी हो जाता हूँ। हर चीज़ की गुणात्मकता देखने—परखने की आदत बन गई है। इसीलिए खरीदो—फरोख्त करने के लिए मैं उनके साथ कम जा पाता हूँ। मुझे बड़े—बड़े शो—रूमों की बजाय साधारण दुकानों पर जाकर कुछ भी बहुत खरीदना अच्छा लगता है क्योंकि उनसे संवाद की स्थिति सहजे से बन जाती है। पहचान बनती—बढ़ती है। जो सदैव ही मेरी कमजोरी बनी रही है। इसी तंगी—फंगी व संघर्ष के दौरान बड़े भैया ने नावल—पत्र—पत्रिकाओं की दुकान की शुरुआत की। यही समय था जब मैंने पाठ्यक्रम से हटकर ढेरों—सैंकड़ों जासूसी—सामाजिक उपन्यास पढ़ डाले। मुंशी प्रेम चंद, शरत्चंद्र, बंकिम चन्द्र चटटेपाध्याय, रवीन्द्रनाथ टैगोर, गुरूदत्त जैसे महान उपन्यासकारों की लगभग सभी कहानियाँ और उपन्यास आठवीं—नवीं कक्षा तक ही पढ़ डाले थे। चंद्रकांता संतति, भूतनाथ, रोहतास मठ जैसे उपन्यास 13—14 वर्ष की आयु में ही एक जुनून के तहत पढ़ गया था। उस समय के चर्चित साप्ताहिक 'ब्लिटज़Ó ने मेरे अंदर राजनीतिक चेतना को उजागर किया था। शायद यही वजह है कि आज मेरी अधिकतर कविताएँ राजनीतिक बोध की सूचक हैं। काश कि आज के तथाकथित आलोचक बिना राग द्वेष के मेरी कविताओं को पढऩे की जहमत तो उठाते। मैं हमेशा अपने परिचितों—मित्रोंं के सामने प्रश्र बना रहा हूँ। न जाने क्यों और कैसे इस स्थिति से दो चार होना पड़ा। सभी की शिकायतों—उम्मीदों पर कभी पूरा नहीं उतरा हूँ। माता—पिता का चहेता बेटा होने के बावजूद उन्हें खुश—सन्तुष्ट नहीं कर सका। बड़े भाई—बहनों को अपने ऊपर गर्व करते कभी नहीं देखा। गुरुवर डा. संसार चंद्र, स्व. डा. चंद्रशेखर, श्री के.के.दीपक, डा. ओंकार राही, डा. बी.आर.गुप्ता जैसे गुरूओं को मैंने उनकी उम्मीदों से बहुत परे का सुकून दिया—ऐसा वे मानते रहे थे। आज भी उनसे बराबर सम्पर्क बना है—वे मुझपर गर्व करते हैं।
तत्पश्चात, परिवार के विरोध व उनकी असमर्थता के बावजूद मैंने खालसा कालेज जालन्धर में एम.ए. हिन्दी के लिए प्रवेश लिया। इस सब का शत—प्रतिशत श्रेय गुरुवर स्व. डा. चंद्रशेखर का ही था। उनका सहयोग—समर्थन न मिलता तो तो शायद मैं सिरसा छोड़ जालन्धर ही न आ पाता। खैर.......जैसे—कैसे मैंने हिंदी एम.ए. पास की। स्थायी नौकरी पाने में मुझे तीन वर्ष लग गए। इस बीच जालन्धर के प्रकाशकीय संसार में बतौर प्रूफ रीडर एवं अनुवादक संघर्ष शुरू किया। इस सब का श्रेय प्रिय मित्र जसपाल समलोक के लिए रिज़र्वड है। मुद्रण संबंधी बारीकियों की जानकारी भी मुझे उनकी प्रिंटिंग प्रैस से ही मिली—परिणाम स्वरूप मुद्रण—प्रकाशन की कला मेरे व्यक्तित्व की अहम् पहचान बन गई है।
मित्रों का मानना है कि मैं सफल गोष्ठीबाज़ हूँ। सच है गोष्ठियाँ करना/करवाना मेरी आदत में शुमार है। मुझे लगता है कि गोष्ठी साहित्य की प्रतिध्वनि सिद्ध होती है। श्रोताओं—पाठकों को जागरूक करती है—मिलने /मिलाने का ज़रिया बनती है, सम्बन्धों में गरिमा पैदा करती है और तार्किक शक्ति देती है। स्नातक होते—होते सिरसा में होने वाली लगभग हर साहित्यिक—$गैर साहित्यिक गोष्ठियों की प्रबन्धकीय जिम्मेदारी कम—ज्यादा मेरे कन्धों पर होती। जालन्धर पहुंचा, विद्यार्थी—काल में खालसा कालेज, दोआबा कालेज या फिर डी.ए.वी कालेज में आयोजित गोष्ठियों में किसी भी प्रकार के निश्चित किए गए उत्तरदायित्व को निभाने में मुझे सुकून मिलता। इसी दौरान सर्वश्री गिरिजा कुमार माथुर, विश्व प्रकाश दीक्षित 'बटुकÓ, डा. संसार चंद्र,डा. लक्ष्मी नारायण लाल, मोहन राकेश सरीखे कवियों /लेखकों के लिए गोष्ठियाँ करने/ करवाने में अहम् भागीदारी निभाता रहा। नकोदर में पहली गोष्ठी का आयोजन डी.ए.वी कालेज, नकोदर में किया था। डा. चंद्र शेखर इस गोष्ठी के मुख्यअतिथि थे और शिव कुमार बटालवी विशिष्ट कवि। बटालवी अपने अंदाज़ में विरह की तान छेडऩे लगे। श्रोता उन्हें सुनकर दीवाने हो रहे थे। पाश अपने आरम्भिक दौर में था—गुस्सैल, बेकाबू। उसने मंच पर पहुंच शिव बटालवी को ऐसी कविताएं लिखने और प्रस्तुत करने की चेतावनी दी और उन्हें मंच से उतरने को मजबूर किया। हंगामा हो गया। बटालवी को नाराज़ होना ही था—हम उन्हें आश्वस्त नहीं कर सके और वह चले गए। यह घटना भूले नहीं भूलती।
फिर यह सिलसिला ऐसा चला कि पंजाबी हिन्दी के लगभग 150—200 लेखकों को नकोदर व आसपास के साहित्य प्रेमियों को रूबरू करवाया। उस्ताद शायर स्व. जोश मलसियानी जी के शेष रहे कार्य को पूर्ण करने की भरसक कोशिश रही। मेरी इस कोशिश में प्रो. कर्मजीत गिल, स्व. विनोद सागर, गुरचरण अरोड़ा, डा. अनिल धीमान ने शतप्रतिशत सहयोग दिया। यह मानने में मुझे कतई गुरेज़ नहीं कि पंजाब का पंजाबी / हिन्दी का कोई ही कवि / लेखक होगा जो हमारे निमन्त्रण पर नकोदर न पहुंचा हो। एक लंबे समय तक नकोदर लेखकों / लेखिकाओं के लिए तीर्थ—स्थली बना रहा। सच कहूँ — मुझे कम लिखने का कतई अ$फसोस नहीं रहा। और न ही अपने आप से कोई शिकायत। हालांकि मुझमें बहुत कुछ लिखने—करने के असीम सामथ्र्य है—ऐसा मित्रों को ही नहीं मुझे भी लगता है।
मेरे लिखने की स्पीड बहुत नहीं है। मेरे मित्रों को मुझसे बहुत अधिक उम्मीदें रहती हैं। उन्हें लगता है कि मेरा सबसे बड़ा दुश्मन मैं स्वयं ही हूँ। बहुत बार महत्वपूर्ण कार्य को स्थगित कर देना मेरी नियति बन गई है। क्या करूँ—जीवन कभी भी नियमित नहीं रहा। हर क्षण, हर पल मैं अपने को व्यस्त पाता हूँ। कभी खाली भी नहीं बैठता। ढेरों महत्वपूर्ण कार्य स्थगित हो जाते हैं। तर्कों—कुतर्कों के सहारे अपने आपको दोषमुक्त कर लेता हूँ और तनाव से छुटकारा पा लेता हूँ।
लगभग एक डेढ़ वर्ष पूर्व से जालन्धर शहर मेरी कर्मभूमि हो गया है। हिन्दी के लिए 'जनश्री एक प्रयासÓ जारी है। मास में एक बार हिन्दी के कवि—लेखक मिल बैठते हैं अच्छा लगता है और सार्थक भी; क्योंकि सभी कुछ—न—कुछ नया लिख कर लाते हैं और सुनते—सुनाते हैं। और साहित्य—सम्पदा में वृद्धि करते हैं।
1970 को मैं अपने जीवन का दूसरा पड़ाव मानता हूँ। जब जीवन की भगदड़ से निजात महसूस की थी—नकोदर में स्थायी रूप से आ टिका था। इसे पूर्व 1968—69 में बी.यू.सी. कालेज बटाला, राजकीय कालेज मलेरकोटला, गुरूनानक कालेज काला अफगाना की अस्थायी नौकरियों ने बार—बार उखाड़ा और तोड़ा भी। उन दिनों लग रहा था कि मेरी रचनात्मकता बेहाल हो रही है। डी.ए.वी. कालेज, नकोदर में बतौर हिंदी विभागाध्यक्ष नियुक्ति हुई थी। नैतिकता मेरे जीवन की हमेशा ढाल रही है। कालिज में अपनी आदतानुसार जि़म्मेदारियों का बोझ अपने ऊपर लेता चला गया। 1970 में ही शादी कर / करवा ली। जि़ंदगी एक नये ट्रैक पर चल निकली—सब कुछ अच्छा लगने लगा—अपने को सुरक्षित महसूस किया। हम एक दूसरे को बनने / बनाने में लग गए। बिना परामर्श आज तक हम कोई निर्णय नहीं लेते। अकेले—अकेले हम बहुत कम सफर करते हैं। हमारी दिनचर्या एकाध घंटे की आपसी गुफ़्तगू से शुरू होती है—इस बीच दो—एक बार चाय पीना मेरी मजबूरी होता है। सन्दीपिका चाय बिल्कुल नहीं पीती—उसे चाय का स्वाद तक नहीं पता। सर्दियों में वह अक्सर कॉफी पी लेती है मात्र अतिथियों का औपचारिक साथ देने के लिए या फिर किसी छोटे—बड़े समारोह में। इसके विपरीत मैं तलबवश दिन में कई बार चाय पी लेता हूँ। बस सांय 6—7 बजे के बाद चाय नहीं पीता—कुछ भी नहीं पीता। सिगरेट—शराब—मांस आदि अन्य किसी भी नशीले पदार्थ में मुझे कोई रुचि नहीं होती—कुछ भी खाना पीना मेरे लिए कभी कोई मजबूरी नहीं रहा।
मैं क्या कुछ जानता हूँ—मुझे कई बार खुद भी नहीं पता लगता। बचपन में बाईडिंग का काम सीखा, लिफाफे बना कर बेचे, पतंग बनाई,उड़ाई और बेची भी। रोटी—सब्ज़ी बनाने का अनुभव बचपन से ही मिल गया था—वैसे यह सब मेरी रुचि में ही शामिल था। जालन्धर में मुद्रण के गुर सीखे और 1975 में प्रिन्टिंग प्रैस स्थापित कर दी—पत्नी सन्दीपिका के सहयोग से। तब तक हिंदी में 'फिरÓ और 'रिजुताÓ पंजाबी पत्रिकाओं के कई अंक निकल चुके थे। 'फिरÓ पत्रिका ने मुझे बतौर सम्पादक पहचान दिलाई। इससे पूर्व 'कीड़ेÓ 1969 में 'वक्त की साजिश के खिला$फÓ 1975 में,'आदमी जि़ंदा हैÓ (1987), बरगद को कटते हुए देखना (1997)और पंजाबी में निंदर घुघियाणवी द्वारा अनूदित 'हवा वांगÓ (1997), और अब 'काले पृष्टों पर उकरे शब्दÓ नाम से नया काव्य—संग्रह प्रकाशित हुआ है।
छोटे—बड़े साधारण ढाबों में बैठकर खाना और उनके मालिकों व नौकरों—चाकरों से बतियाने में मुझे मज़ा ही नहीं अपने अंदर एक खास किस्म की एनर्जी का संचार होता महसूस होता है। हालांकि यह जानते हुए भी कि यह लोग भोजनादी तैयार करने में सफाई का कतई ध्यान नहीं रखते—फिर भी जरूरत पडऩे पर हम उन्हीं के यहाँ से खाना खाते हैं। वैसे यह सब कभी—कभार ही होता है। मेरी पत्नी सन्दीपिका एक बढिय़ा कुक है— लज़ीज़ खाना बनाती है—समय रहते रसोई में कभी—कभी मैं भी उसका सहयोग करता हूँ। हर काम को कला के रूप में सीखना अच्छा लगता है। पेन्टिंग और फोटोग्राफी करना मेरी पहली पसन्द रही है। शायद इसीलिए बचपन से लेकर अब तक पेन्टरों और फोटोग्राफरज़ से मित्रता रखना मेरे जुनून में शामिल है। लगातार अब तक खेद बना है कि मैं अच्छा—बढिय़ा कैमरा नहीं खरीद सका। फिर भी साधारण कैमरों से ढेरों—सैंकड़ों फोटो खींचीं और अब मैं यह काम अपने मोबाईल से करता हूँ और इस कला का प्रयोग अपने मुद्रण—व्यवसाय में करता हूँ। अपने बुजुर्गों के बारे में बहुत कम जानता हूँ। जब यह सब कुछ जाना जा सकता था तब ज़रूरत नहीं समझी और अब माता—पिता नहीं रहे—बड़े भाई—भाभी असमय ही चल बसे। सबसे बड़ी और छोटी बहन का देहावसान मेरे संघर्ष की आपाधापी में ही हो गया। आज तक अजीब सा खेद भी है और इसे मैं प्रकट भी नहीं कर पाता। दादा—दादी की शक्ल आँखों में बसी है। पिता को बरगद होते देखा है। माँ का स्नेह—प्यार उनके आखिरी दिन तक पाने वाला भाग्यशाली रहा हूँ। बड़े भाई का संसर्ग उनके जीवन के आखिरी दिनों में रोगग्रस्त होने के कारण मुझे मिला—वे बड़े ही नर्म दिल इन्सान थे। मैंने उन्हें कभी किसी से झगड़ा करते हुए नहीं देखा था। उनका असमय निधन आज तक कचोटता है। उनके दो बेटे व एक बेटी यानी मेरे भतीजे और भतीजी—सभी शादी—शुदा हैं। वे दो—दो बेटों के पिता हैं। अच्छा—खासा काम—धन्धा है। सन्तुष्ट हूँ कि वे सभी हमारी इज्जत करते हैं—खूब लगाव महसूस करते हैं। अक्सर पारस्परिक खोज—खबर लेते—देते रहते हैं, बराबर प्यार बना है। दो बड़ी बहनें, जिन्होंने मुझे बेटे की तरह प्यार—स्नेह और संरक्षण दिया। उनसे उऋण होना कम—से—कम इस जन्म में तो सम्भव नहीं। वे हर समय मेरे बारे में चिन्तित रहती हैं। उन्होंने नदी की तरह मेरे जीवन को सींचा है।
दो—एक शब्द अपने प्राध्यापकीय जीवन में अति आत्मीय बने रहे छात्र—छात्राओं के बारे में जो मुझे अब तक सम्मान की दृष्टि से देखते हैं और अपने जीवन को अर्थवान बनाने में कम—ज्यादा मेरी भूमिका को स्वीकारते हैं—वैसे यह सब उनकी उदारता है। स्व. अशोक रिखी, विजय रिखी(मलेरकोटला), डा. तरसेम गुजराल, यकम(जालन्धर), भूपेन्द्र परिहार (लुधियाना), राजेन्द्र चुघ (दिल्ली), कृष्ण कुमार रत्तू (जयपुर), रछपाल कलेर (नकोदर), रमेन्द्र जाखू (चण्डीगढ़), देवेन्द्र कुमार चन्द्र (इंग्लैंड), हंस राज (दिल्ली), आर.डी.शर्मा (नेपाल), रामपाल चन्द्र (चण्डीगढ़), डा. अनिल धीमान(फिरोज़पुर), स्व. विनोद सागर, स्व. सूरज वधवा, राकेश कलेर, अशोक संधु, युगल कुंदी (नूरमहल),राजेन्द्र कालड़ा, राजबहादुर, लवन जैन, (यू.के.), अंकुश जैन (फरीदाबाद), सुधा जितेन्द्र (अमृतसर), सुषमा (लुधियाना), मृदुला जैन (दिल्ली) आदि की साहित्यिक—सामाजिक उपलब्धियों को मंै अपनी उपलब्धियों में परिणित करता हूँ और गर्व महसूस करता हूँ।
और अब बेटे विराट और बेटियों आस्था, अनुजा के बारे में। हम उन्हें संस्कारों के अलावा कुछ भी नहीं दे सके या यूँ कहूँ कि वे ले नहीं सके। युवा पीढ़ी एकल चलने और त्वरित निर्णय लेने में विश्वास रखती है। कोशिश करता रहा हूँ कि उनपर अपना कोई निर्णय न थोपूँ। तीनों की शादिया्र हो गई हंै, अपनी—अपनी जि़ंदगी अपने अनुसार जी रहे हैं। काम धंधे में बेटे के साथ हूँ। वह संवेदनशील ,स्वप्रशील और एनर्जेटिक है। पत्नी नलिनी और निश्चय बेटे के साथ जीवन को सारयुक्त बनाने की कोशिश में जुटा रहता है। एक दम नि:छल होने के कारण दोस्त / दुश्मन की पहचान करने में हमेशा गच्चा खाता रहता है और वैसे यह कवि होने की पहली शर्त होती है पर वह कवि नहीं सफल व्यवसायी बन रहा है। आस्था—प्रदीप अपनी एक निहायत कुशाग्र बुद्धि वाली बेटी के साथ सुखद भविष्य की तलाश में हैं। और अनुजा परमजीत प्रथम पायदान पर चलते रह सपने बुन रहे हैं। पिता होने के नाते शुभकामनाएं शत:—शत:......
और अंत में अपने संबंध में। इस उम्र में भी मात्र दर्शक बने रहने में मुझे कोई रुचि नहीं होती। अपने फैसलों पर गर्व करना मेरी फितरत बन गई है और बहुत बार समझौते ढोना मजबूरी। मैं समाज—भीरू इन्सान हूँ, अंदर से नहीं, बाहर से। आज भी अधूरे पड़े सपनों की फेहरिस्त बड़ी लंबी है। समयाभाव के बावजूद कोशिश में रहता हूँ कि पारिवारिक और सामाजिक दायित्व को पूरी तरह से निभाऊँ। न जाने क्यों अपने और पत्नी के स्वास्थ्य के प्रति न चाहते हुए भी उदासीन बना रहता हूँ—यह सब अच्छा तो नहीं ही है।
(यह लेख पुस्तक डॉ. रूप देवगुण द्वारा संपादित पुस्तक ऐसे होते हैं साहित्यकार में संकलित है)
Tuesday, July 13, 2010
दो प्रेम कविताएं : मोहन सपरा
।।१।। प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ
मिट्टी ने समर्पण किया
और घड़ा हो गई,
ईंट बन गई
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।
जल ने समर्पण किया
और नदी हो गया
समुद्र हो गया
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।
बीज ने समर्पण किया
औÓ फूल बन गया
वृक्ष बन गया
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।
।।२।। प्रेम
प्रेम, हर लहर में
विद्युत की तरह
पसरा पड़ा है
देखें, आओ देखें, औÓ मोहित हो जाएं।
प्रेम, हर शहर में
खुशबू की तरह
फैला पड़ा है
ढूंढें, आओ ढूंढें, औÓ उसी के हो जाएं।
प्रेम, हर पहर में
पुलक की तरह
बसा पड़ा है
छुएँ, आओ छुएँ, औÓ गद्गद हो जाएं।
प्रेम, हर स$फर में
पड़ाव की तरह
बिखरा पड़ा है
रुकें, आओ रुकें, औÓ समर्पित हो जाएं।
मोबा० 98145—27152
मिट्टी ने समर्पण किया
और घड़ा हो गई,
ईंट बन गई
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।
जल ने समर्पण किया
और नदी हो गया
समुद्र हो गया
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।
बीज ने समर्पण किया
औÓ फूल बन गया
वृक्ष बन गया
प्रेम संग, प्रेम ही तो हुआ।
।।२।। प्रेम
प्रेम, हर लहर में
विद्युत की तरह
पसरा पड़ा है
देखें, आओ देखें, औÓ मोहित हो जाएं।
प्रेम, हर शहर में
खुशबू की तरह
फैला पड़ा है
ढूंढें, आओ ढूंढें, औÓ उसी के हो जाएं।
प्रेम, हर पहर में
पुलक की तरह
बसा पड़ा है
छुएँ, आओ छुएँ, औÓ गद्गद हो जाएं।
प्रेम, हर स$फर में
पड़ाव की तरह
बिखरा पड़ा है
रुकें, आओ रुकें, औÓ समर्पित हो जाएं।
मोबा० 98145—27152
मैं तो हंसना चाहता हूं
मैं तो हंसना चाहता हूं
आप मेरी मदद कीजिए
मुझे हर सबब मुहैया करवाइए
मेरी $जरूरतें समझिए
दाल-भात के सिवाय भी
मुझे बहुत कुछ चाहिए
जानने के लिए
समझाने के लिए
देने के लिए
अरे, मैं तो हंसना चाहता हूं
आप मेरी मदद क ीजिए ।
मुझे रिक्शा चालक के पसीने का अर्थतन्त्र समझना है
पतिहीना के चरित्र-तंत्र का गणित
हल करना है,
यह जो बबुआ
चाय की दुकान पर काम करता है
जूठे बरतन उठाता है-मांजता है
फिर भी चोरी करता है-
उसके हृदय का खुलासा करना है
आप मेरी मदद कीजिए।
मैं तो हंसना चाहता हूँ
मुझसे हाथ मिलाइए
और पक्की बात कीजिए
आप मेरी मदद करेंगे ।
सच जानें,
बच्चा जनती औरत
अगर मरती है
तो मुझे
अ$फसोस नहीं-$गुस्सा आता है,
भवन-निर्माण के व$क्त
म$जदूर का गिरना और दम तोडऩा
मुझमें सहानुभूति नहीं
ग्लानि भरता है
बेटा, पिता को गाली देता है
तो मुझे
आश्चर्य कम
अश्लील ज्य़ादा लगता है।
अरे.... यह जो कल सायं
पड़ोस में बहू पिटी-
पति से, सास-ससुर से, ननद से
तो मुझे दु:ख से कहीं ज्य़ादा
हीनभावना से प्रताडि़त होना पड़ा था
कि मैं कुछ करता क्यों नहीं!
कितना दु:खान्त है
कि मैं तो हंसना चाहता हूं
पर उदास हो जाता हंू
और उदासी
मुझे हैरान करती है
परेशान करती है
तब मेरे लिए
जीवन की परिभाषा ही बदल जाती है।
आप मेरी मदद कीजिए
मुझे हर सबब मुहैया करवाइए
मेरी $जरूरतें समझिए
दाल-भात के सिवाय भी
मुझे बहुत कुछ चाहिए
जानने के लिए
समझाने के लिए
देने के लिए
अरे, मैं तो हंसना चाहता हूं
आप मेरी मदद क ीजिए ।
मुझे रिक्शा चालक के पसीने का अर्थतन्त्र समझना है
पतिहीना के चरित्र-तंत्र का गणित
हल करना है,
यह जो बबुआ
चाय की दुकान पर काम करता है
जूठे बरतन उठाता है-मांजता है
फिर भी चोरी करता है-
उसके हृदय का खुलासा करना है
आप मेरी मदद कीजिए।
मैं तो हंसना चाहता हूँ
मुझसे हाथ मिलाइए
और पक्की बात कीजिए
आप मेरी मदद करेंगे ।
सच जानें,
बच्चा जनती औरत
अगर मरती है
तो मुझे
अ$फसोस नहीं-$गुस्सा आता है,
भवन-निर्माण के व$क्त
म$जदूर का गिरना और दम तोडऩा
मुझमें सहानुभूति नहीं
ग्लानि भरता है
बेटा, पिता को गाली देता है
तो मुझे
आश्चर्य कम
अश्लील ज्य़ादा लगता है।
अरे.... यह जो कल सायं
पड़ोस में बहू पिटी-
पति से, सास-ससुर से, ननद से
तो मुझे दु:ख से कहीं ज्य़ादा
हीनभावना से प्रताडि़त होना पड़ा था
कि मैं कुछ करता क्यों नहीं!
कितना दु:खान्त है
कि मैं तो हंसना चाहता हूं
पर उदास हो जाता हंू
और उदासी
मुझे हैरान करती है
परेशान करती है
तब मेरे लिए
जीवन की परिभाषा ही बदल जाती है।
मोहन सपरा
संकलन ''काले पृष्ठों पर उकरे शब्द'' में से
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